Thursday, April 23, 2020

कवयित्री सुशीला जोशी 'विद्योत्मा' की पुस्तक --" ये कविताएँ बोलतीं है" मेरी दृष्टि में ....... संजय कौशिक 'विज्ञात'



कवयित्री सुशीला जोशी 'विद्योत्मा' की पुस्तक --" ये कविताएँ बोलतीं है" मेरी दृष्टि में ....... संजय कौशिक 'विज्ञात'

     कवयित्री सुशीला जोशी -विद्योत्मा की कविताओं की पुस्तक "कविता बोलती हैं" अपने पूरे मनोयोग से पढ़ी। और बारबार पढ़ने को मन करता रहा। इन कविताओं में साधारण मानसिकता के व्यक्ति को स्वयं से जोड़ लेने की अपार क्षमता उपस्थित है। कवयित्री विद्योत्मा की ये कविताएं भले ही आज से कई दशक पूर्व के छायावादी-युग की उपज रही हैं परंतु इनमें आज भी वही लालित्य माधुर्य और नावीन्य स्पष्ट बोध से प्रचुर मात्रा में उपस्थित है। यद्यपि विद्योत्मा के अनुसार ये कविताएँ छह दशकों पूर्व लिखी थी लेकिन उनकी कविता- गुल्लक, किसी रुद्र से परे नही हूँ और आधार जैसी सशक्त अभिव्यक्ति को पढ़ कर लगा कि ये रचना आज के ही परिवेश का प्रतिनिधित्व कर रहीं हैं। 
       कवयित्री विद्योत्मा की कविताओं में छायावादी छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इनकी कविताओं में मानवीकरण और प्रकृति से अनूठे लगाव की व्यंजना स्पष्ट देखी जा सकती है। इनकी कविताएँ छायावाद के चारो स्तम्भों का स्मरण कराती है।  सुशीला जी की कविता कोयल का गीत जहाँ एक ओर साधारण जन को आकर्षित करता है वहीं उनके लिए उसका स्वर संवेदनशील हृदय को कभी दोलित करता है, कभी विकल तो कभी किसी निठुर प्रिय की स्मृति से घिरा अनुभव कराता है --
    मूक क्षणों में गान तुम्हारा 
    बन जाता है शोक राग सा 
    पीड़ित विकल याद से मानस 
    बन जाता भू लोक फ़ाग  सा।।
    जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि --- इस कहावत की पुष्टि होते हुए मैंने कवयित्री विद्योत्मा की कविताओं में देखी है। इनकी कविताएँ एक तरफ तो उच्चस्तरीय कल्पना की अगुवाई करती हुई दिखती हैं तो दूसरी तरफ यथार्थवाद का झण्डा थामें लहराती सी प्रतीत होती हैं। यह आकर्षण मुझे इनकी कविता -
शीर्षक "पीड़ा"  में देखने को मिला --
   धुँधाच्छन्न आकाश पटल 
  रहता है नित हृदय रंजित 
  प्रबल वात के शर प्रहार सा 
  जीवन हो उठता हिल्लोलित।।
उपरोक्त पंक्तियों में कल्पना के चित्रित पँखो के अनुरूप उनके शब्द-चयन रूपी पक्षी की उड़ान देखने और सराहने योग्य है। 
      यद्यपि विद्योत्मा का यह संग्रह गीतों का नही है तथापि इनकी इन कविताओं में गेयता का बोलबाला भी है। शीर्षक -- "अकुलाहट" कविता की पंक्तियाँ देखिए --
     घूमता निर्मम पपीहा 
     पी-कहाँ कह कर सुनाता 
     विचरता मृग एक छौना 
     कुछ मिलन के गीत गाता ।।
             जहाँ मैंने कवयित्री विद्योत्मा के नवगीतों में उनके यथार्थ बिम्बो में टटकी भाषा पढ़ी है, वहीं इन कविताओं में प्रांजल भाषा भी देखने को मिली है। कवयित्री के अगीत-संकलनों में  'सत्यं-शिवं -सुंदरम' के दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं वहीं इन कविताओं में भी यह  दृष्टिकोण अडिग हिमालय स्वरूप खड़ा दिखाई दे रहा है। शीर्षक-- "तार साध लो" कविता में कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ --
    अनहद नादों में खो कर मैं 
    दिन में भी सपने देखूँगी 
    मादकता आँचल में भर कर 
    मैं बढ़ अपने को खोजूँगी।।
  यद्यपि कवयित्री की भाषा में हिंदी से इतर भाषाओं व बोलियों के शब्द पढ़ने को मिलते हैं लेकिन इनके प्रयोग किसी अंलकार से कम परिलक्षित नहीं होते हैं। 
    कवयित्री विद्योत्मा अपने काव्य में अलंकारों का प्रयोग सायास नही करती। एक कविता शीर्षक -- "व्रीडा" में ये पंक्तियाँ  हैरान करने को पर्याप्त हैं --
   आई मन में  छाई तन में 
   सिहर ठिठक सब बन्ध गए 
   हुआ गगन स्वर्णिम आरक्तिक
   खग कलरव निर्द्वन्द गए।।

  चपल चमक चपला सी मन में 
  मेरे मन को रोक लिया 
  कैसे करूँ अभिसार सखी!मैं 
  उसने मुझको टोक दिया ।।
 स्वयं कवयित्री सुशीला जोशी विद्योत्मा के अनुसार ये कविताएँ कई दशकों पूर्व लिखी गयी थीं लेकिन पढ़ कर सिद्ध होता दिखाई पड़ रहा है कि हृदय की संवेदना, कल्पना, और शिल्प का न बचपन होता है, न यौवन और न ही चौथापन। वह तो माँ वाणी का वरदान है जो हर अवस्था में सौंदर्यमय दिखाई देता है। 
    कवयित्री सुशीला जोशी विद्योत्मा की कविताएँ पढ़ कर कभी सुमित्रानंदन पन्त की कविता "नक्षत्र", "मौन निमन्त्रण", "गा कोकिल बरसा पावन कण", "झर पड़ता जीवन डाल से" और "ग्राम कवि" की याद दिलाती हैं वहीं महादेवी वर्मा की कविता - "रश्मि", "उस पार", "दीपक में पतंग जलता क्यों" जैसी कविताएँ मानस पटल पर अपना वर्चस्व बनाये रखने में पीछे नही हटती। 
     एक अच्छी निखरी हुई सशक्त साहित्यकार की पुस्तक "ये कविता बोलती हैं" की समीक्षा लिखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ इसके लिए कवयित्री सुशीला जोशी विद्योत्मा का आत्मीय आभार प्रकट करता हूँ। इन्होंने मुझे समीक्षा लिखने के लिए आमंत्रित किया, इतनी सुंदर सी रचनाओं को पढ़ने का अवसर प्रदान किया। रवीना प्रकाशक चन्द्रहास जी के कार्य की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है, अच्छे पृष्ठ, सुंदर, छपाई, और आकर्षक आवरण के साथ प्रेषित की जा रही है। 
कवयित्री सुशीला जोशी विद्योत्मा का यह संग्रह 
"ये कविता बोलती हैं" की रचनाएँ साहित्य जगत में विशेष स्थान स्थापित कर पाएँ इन्हीं शुभकामनाओं के साथ ढेरों बधाई प्रेषित करता हूँ।

संजय कौशिक विज्ञात
समालखा, पानीपत, हरियाणा
132101

4 comments:

  1. हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई आदरणीया ।

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  2. बहुत शानदार समीक्षा ,एक निष्पक्ष समालोचना जो कुछ कमियों पर भी प्रकाश डालते हुए भी गुणग्राहकता पर अभिनव टिप्पणी और टीका के साथ संग्रह के प्रति रुझान बढ़ाने वाला है ।
    आदरणीय कवियत्री महोदया और समीक्षक महोदय दोनों को अप्रतिम कार्य के लिए बहुत बहुत बधाई।

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  3. बहुत बहुत बधाई

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  4. बहुत ही खुबसूरत रचनाएं और ज्ञान वर्धक

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