Wednesday, May 19, 2021

बारिश में भीगती नदी : कवयित्री आरती सिंह 'एकता' समीक्षक : संजय कौशिक 'विज्ञात'





कवयित्री आरती सिंह 'एकता'



समीक्षक - संजय कौशिक 'विज्ञात'
 
बारिश में भीगती नदी 
आरती सिंह एकता 
बस्तर अंचल में जन्मी पैतृक स्थान वाराणसी से संबंधित हरिद्वार उत्तराखंड की पावन गङ्गा के क्षेत्र में पली और बढ़ी और हाल ही में नागपुर महाराष्ट्र में प्रतिष्ठित परिवार का हिस्सा बनकर रह रही कवयित्री आरती सिंह 'एकता' बहुत ही कम समय में अपने विख्यात नाम से अलग पहचान बन चुकी हैं जो किसी परिचय की अपेक्षा नहीं रखती .... 
अभी कुछ समय पूर्व ही एक दिन अचानक डाक द्वारा मुझे उनकी एक उपलब्धि प्राप्त हुई। उनका एकल काव्य संग्रह जिसका शीर्षक बारिश में भीगती नदी ... मानवीकरण धारा तथा प्रकृति नेह और अनछुए रहस्य का कविता के माध्यम से अंतःकरण को छू जाने की कला का एक उत्तम संगम प्रवाह इस संग्रह में देखते ही बनता है। कवयित्री एकता की कल्पना शक्ति रचना प्रति रचना प्रशंसा की पात्रा है। भाषा शैली सरल सरस एवं इतनी सहज है कि पाठक वर्ग आनंद की लहरों में भावों की गहराई में डूबता ही चला जाता है। 96 पृष्ठ में समाहित यह काव्य संग्रह बहुत ही आकर्षक और मन मोहक सशक्त भावाभिव्यक्ति का ऐसा अनूठा बेजोड़ संकलन कहा जा सकता है जो नवांकुरों के लिए प्रेरणा का केंद्र तो है ही साथ ही जो कविता के निकट नहीं आ सके हैं, यदि उन्होंने इस संकलन को पढ़ा तो वे भी काव्य सीखने रचने और संग्रह को पूरा पढ़ कर आनंद की गहराइयों से वंचित रहना नहीं चाहेंगे ...
संग्रह में रंगीन पृष्ठों की उपस्थिति इस संग्रह की बनावट को चार चांद लगा रहे हैं। संग्रह श्री माँ के रंगीन पृष्ठ समर्पण से प्रारम्भ होता है अपनी बात में कवयित्री ने अपने सशक्त पक्ष को रखा है जो संग्रह के प्रति आकर्षण पैदा करने के लिए एक सार्थक और सुंदर प्रयास दिखता है। संक्षिप्त और सार गर्भित भूमिका उषा अग्रवाल पारस नागपुर द्वारा लिखी गई है जबकि मुख्य भूमिका भी संकलन में सम्मिलित की गई है जो डॉ. आशीष कंधवे दिल्ली ने लिखी है।अनुक्रमणिका संग्रह का परिचय स्वयं देती है। आवरण गत्ते की बंधाई में है इतना सुंदर संग्रह जिसका मूल्य भी अधिक नहीं मात्र 300 रुपये लिखा गया है इससे प्रतीत होता है पुस्तक का मूल्य केवल खर्च को ही पूर्ण कर रहा है कवयित्री का उद्देश्य रॉयल्टी से कमाई करना नहीं। विश्व हिंदी साहित्य परिषद प्रकाशन का यह प्रयास सराहनीय है। पुस्तक पाठक वर्ग के लिए तैयार है।  मैं स्वयं इस संग्रह के प्रति आकर्षण की चर्चा करूँ तो अस्वस्थ होने के पश्चात भी पढ़ते रहने को मन रहा और अंततः आज पूर्ण हुआ तो आप सभी के समक्ष इस संग्रह की संक्षिप्त समीक्षा प्रेषित कर रहा हूँ और कवयित्री एकता को उपलब्धि की अनंत बधाई प्रेषित कर शुभकामना देता हूँ अपने सृजनकार्य निरन्तर करती रहें ... और पाठक वर्ग को इसी प्रकार सुंदर और प्रेरणादायक रचनाओं से मंत्र मुग्ध करती रहें। पाठक वर्ग पुस्तक को पढ़ने के पश्चात अपनी प्रतिक्रिया खुशी में स्वयं व्यक्त भी करेगा और अन्य साथियों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करेगा ऐसा मेरा अनुमान है। पाठक का पैसा वसूल करवाने वाला यह संग्रह साहित्य जगत में स्थापित होकर एकता नाम को एक सम्मान दिलाने में सफल सिद्ध हो सके पुनः अशेष शुभकामनाएं ....

Tuesday, May 18, 2021

उफान के उपरांत- त्रिसूत्री अनूठा उपन्यास की समीक्षा, साहित्यकार : संजय कौशिक विज्ञात : के द्वारा


डॉ. राजेन्द्र मिलन आगरा 

उफान के उपरांत-
       त्रिसूत्री अनूठा उपन्यास
की समीक्षा साहित्यकार संजय कौशिक विज्ञात के द्वारा 

हिंदी साहित्य में यह उपन्यास  मातृभाषा हिंदी एवं हिंदी पत्रकारिता तथा सीमा पर तैनात वीर जवानों की प्राण पर खेल जाने की ललक को बुलंदियों पर पहुंचाने वाला एक कालजयी जीवंत दस्तावेज है जो हिंदी साहित्य की निधि में सूर्यमणि की तरह दैदीप्यमानन है । उपन्यास के शीर्षक उफान के उपरांत की सार्थकता सिद्ध करने में लेखक के अंदर सआदत हसन मंटो और कमलेश्वर जैसे महान कथा शिल्पियों की आत्माओं का अपूर्व संगम प्रवेश करता जान पड़ता है। आगरा के  बहुआयामी रचनाकार मिलनजी के विविध विधाओं - व्यंग्य कविता कहानी पर्यावरण पर्यटन  रिपोर्ताज आदि में मूल्यांकन किया जाए तो इनकी प्रतिभा का लोहा मानना ही पड़ेगा ।मुझे यहां उपन्यास के संदर्भ  में यह  कहना है कि हिंदी साहित्य के इस बेजोड़ उपन्यास को पढ़ने पर शुरू में ऐसा एहसास होता है कि हम किसी सैक्स से सराबोर रंगीले रोमांचकारी उपन्यास को पढ़ रहे हैं किंतु जैसे -जैसे हम आगे पढ़ते हुए इस उपन्यास के अंतिम सोपान पर पहुंचते हैं तब लेखक की लेखनी पर नतमस्तक हो जाते हैं  । उपन्यास की अतिरिक्त विशेषता यह है इसमें डायरी ,आत्मकथा एवं औपन्यासिक शैली की त्रिपथगा का अनूठा आनंद भी मिलता है और उपन्यास को अन्त तक पढ़ने की लालसा भी बनी रहती है । 
अधिक और कुछ न कहकर मैं, डा. राजेंद्र मिलन को सादर प्रणाम करते हुए उनके इस उपन्यास का हृदय से स्वागत एवं अभिनंदन करता हूं ।

साहित्यकार संजय कौशिक 'विज्ञात'
वार्ड नं. 2 संगम कॉलोनी बिहोली रोड़ निकट हनुमान मंदिर समालखा, पानीपत, हरियाणा पिन - 132101
चलभाष 9991505193
अणु डाक vigyaatprakashan@gmail.com


Thursday, April 23, 2020

कवयित्री सुशीला जोशी 'विद्योत्मा' की पुस्तक --" ये कविताएँ बोलतीं है" मेरी दृष्टि में ....... संजय कौशिक 'विज्ञात'



कवयित्री सुशीला जोशी 'विद्योत्मा' की पुस्तक --" ये कविताएँ बोलतीं है" मेरी दृष्टि में ....... संजय कौशिक 'विज्ञात'

     कवयित्री सुशीला जोशी -विद्योत्मा की कविताओं की पुस्तक "कविता बोलती हैं" अपने पूरे मनोयोग से पढ़ी। और बारबार पढ़ने को मन करता रहा। इन कविताओं में साधारण मानसिकता के व्यक्ति को स्वयं से जोड़ लेने की अपार क्षमता उपस्थित है। कवयित्री विद्योत्मा की ये कविताएं भले ही आज से कई दशक पूर्व के छायावादी-युग की उपज रही हैं परंतु इनमें आज भी वही लालित्य माधुर्य और नावीन्य स्पष्ट बोध से प्रचुर मात्रा में उपस्थित है। यद्यपि विद्योत्मा के अनुसार ये कविताएँ छह दशकों पूर्व लिखी थी लेकिन उनकी कविता- गुल्लक, किसी रुद्र से परे नही हूँ और आधार जैसी सशक्त अभिव्यक्ति को पढ़ कर लगा कि ये रचना आज के ही परिवेश का प्रतिनिधित्व कर रहीं हैं। 
       कवयित्री विद्योत्मा की कविताओं में छायावादी छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इनकी कविताओं में मानवीकरण और प्रकृति से अनूठे लगाव की व्यंजना स्पष्ट देखी जा सकती है। इनकी कविताएँ छायावाद के चारो स्तम्भों का स्मरण कराती है।  सुशीला जी की कविता कोयल का गीत जहाँ एक ओर साधारण जन को आकर्षित करता है वहीं उनके लिए उसका स्वर संवेदनशील हृदय को कभी दोलित करता है, कभी विकल तो कभी किसी निठुर प्रिय की स्मृति से घिरा अनुभव कराता है --
    मूक क्षणों में गान तुम्हारा 
    बन जाता है शोक राग सा 
    पीड़ित विकल याद से मानस 
    बन जाता भू लोक फ़ाग  सा।।
    जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि --- इस कहावत की पुष्टि होते हुए मैंने कवयित्री विद्योत्मा की कविताओं में देखी है। इनकी कविताएँ एक तरफ तो उच्चस्तरीय कल्पना की अगुवाई करती हुई दिखती हैं तो दूसरी तरफ यथार्थवाद का झण्डा थामें लहराती सी प्रतीत होती हैं। यह आकर्षण मुझे इनकी कविता -
शीर्षक "पीड़ा"  में देखने को मिला --
   धुँधाच्छन्न आकाश पटल 
  रहता है नित हृदय रंजित 
  प्रबल वात के शर प्रहार सा 
  जीवन हो उठता हिल्लोलित।।
उपरोक्त पंक्तियों में कल्पना के चित्रित पँखो के अनुरूप उनके शब्द-चयन रूपी पक्षी की उड़ान देखने और सराहने योग्य है। 
      यद्यपि विद्योत्मा का यह संग्रह गीतों का नही है तथापि इनकी इन कविताओं में गेयता का बोलबाला भी है। शीर्षक -- "अकुलाहट" कविता की पंक्तियाँ देखिए --
     घूमता निर्मम पपीहा 
     पी-कहाँ कह कर सुनाता 
     विचरता मृग एक छौना 
     कुछ मिलन के गीत गाता ।।
             जहाँ मैंने कवयित्री विद्योत्मा के नवगीतों में उनके यथार्थ बिम्बो में टटकी भाषा पढ़ी है, वहीं इन कविताओं में प्रांजल भाषा भी देखने को मिली है। कवयित्री के अगीत-संकलनों में  'सत्यं-शिवं -सुंदरम' के दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं वहीं इन कविताओं में भी यह  दृष्टिकोण अडिग हिमालय स्वरूप खड़ा दिखाई दे रहा है। शीर्षक-- "तार साध लो" कविता में कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ --
    अनहद नादों में खो कर मैं 
    दिन में भी सपने देखूँगी 
    मादकता आँचल में भर कर 
    मैं बढ़ अपने को खोजूँगी।।
  यद्यपि कवयित्री की भाषा में हिंदी से इतर भाषाओं व बोलियों के शब्द पढ़ने को मिलते हैं लेकिन इनके प्रयोग किसी अंलकार से कम परिलक्षित नहीं होते हैं। 
    कवयित्री विद्योत्मा अपने काव्य में अलंकारों का प्रयोग सायास नही करती। एक कविता शीर्षक -- "व्रीडा" में ये पंक्तियाँ  हैरान करने को पर्याप्त हैं --
   आई मन में  छाई तन में 
   सिहर ठिठक सब बन्ध गए 
   हुआ गगन स्वर्णिम आरक्तिक
   खग कलरव निर्द्वन्द गए।।

  चपल चमक चपला सी मन में 
  मेरे मन को रोक लिया 
  कैसे करूँ अभिसार सखी!मैं 
  उसने मुझको टोक दिया ।।
 स्वयं कवयित्री सुशीला जोशी विद्योत्मा के अनुसार ये कविताएँ कई दशकों पूर्व लिखी गयी थीं लेकिन पढ़ कर सिद्ध होता दिखाई पड़ रहा है कि हृदय की संवेदना, कल्पना, और शिल्प का न बचपन होता है, न यौवन और न ही चौथापन। वह तो माँ वाणी का वरदान है जो हर अवस्था में सौंदर्यमय दिखाई देता है। 
    कवयित्री सुशीला जोशी विद्योत्मा की कविताएँ पढ़ कर कभी सुमित्रानंदन पन्त की कविता "नक्षत्र", "मौन निमन्त्रण", "गा कोकिल बरसा पावन कण", "झर पड़ता जीवन डाल से" और "ग्राम कवि" की याद दिलाती हैं वहीं महादेवी वर्मा की कविता - "रश्मि", "उस पार", "दीपक में पतंग जलता क्यों" जैसी कविताएँ मानस पटल पर अपना वर्चस्व बनाये रखने में पीछे नही हटती। 
     एक अच्छी निखरी हुई सशक्त साहित्यकार की पुस्तक "ये कविता बोलती हैं" की समीक्षा लिखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ इसके लिए कवयित्री सुशीला जोशी विद्योत्मा का आत्मीय आभार प्रकट करता हूँ। इन्होंने मुझे समीक्षा लिखने के लिए आमंत्रित किया, इतनी सुंदर सी रचनाओं को पढ़ने का अवसर प्रदान किया। रवीना प्रकाशक चन्द्रहास जी के कार्य की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है, अच्छे पृष्ठ, सुंदर, छपाई, और आकर्षक आवरण के साथ प्रेषित की जा रही है। 
कवयित्री सुशीला जोशी विद्योत्मा का यह संग्रह 
"ये कविता बोलती हैं" की रचनाएँ साहित्य जगत में विशेष स्थान स्थापित कर पाएँ इन्हीं शुभकामनाओं के साथ ढेरों बधाई प्रेषित करता हूँ।

संजय कौशिक विज्ञात
समालखा, पानीपत, हरियाणा
132101

कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना : स्वप्न सिंदूरी : एक नजर समीक्षा की दृष्टि से .... संजय कौशिक 'विज्ञात'

स्वप्न सिंदूरी 
एक नज़र समीक्षा की दृष्टि से ....

कवयित्री अनिता मंदिलवार "सपना" ने जीव विज्ञान स्नातकोत्तर, हिन्दी साहित्य और अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर तीन-तीन स्नातकोत्तर करने के पश्चात जीव विज्ञान से ही अध्ययन अध्यापन कार्य जारी रखा है। ऐसे में हिन्दी भाषा साहित्य की गद्य और पद्य पर मजबूत पकड़ भी बनाये रखी है। कवियत्री को लेखन की अनेक विधाएं कलम सिद्ध हस्त प्रतीत होती हैं। 'स्वप्न सिंदूरी' काव्य-संग्रह में बहुत ही सरलता, सहजता, काव्य-प्रवाह, तुकांत अतुकांत अनेक रसों का समावेश की गई सभी प्रकार की कविताए हैं। छंद मुक्त, गीत, नवगीत, हिन्दी ग़ज़लनुमा कविता आदि जितनी भी विधाएं लिखी गई हैं सभी विधाओं में कवयित्री की कलम अपने भाव कहने में सफल रही है।

स्वप्न सुंदरी काव्य संग्रह की कविताओं को जिस भी पाठक वर्ग द्वारा पढ़ा जाएगा तो सहजता से समझा भी सकेगा। कवयित्री का कविता सृजन कार्य मर्मस्पर्शी रहा है। आहत मन से वेदना स्वर फूटता है वो देखते ही बनता है। प्रत्येक विषय के प्रति गाम्भीर्य भाव, गहराई तक समझने की विद्युत सी शक्ति, सुलझा हुआ व्यक्तित्व एवं कोमल हृदयी भाव इन कविताओं से स्पष्ट झलकता है। जो प्रत्येक कविता में पूर्णतः निखर कर प्रकट हुआ है।

कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना द्वारा लिखी गई यह कविता उनकी प्रतिनिधि रचनाओं में से एक है। स्वप्न सिंदूरी छंदमुक्त होने के साथ-साथ तुकांत और लय बद्ध कविता है  इस रचना में उनके स्वप्न सिंदूरी उड़ान की कल्पना और यथार्थ का मिश्रण विद्यमान है कवयित्री के स्वप्न की नायिका अपने नायक का साथ प्राप्त होने की कल्पना को यथार्थ में देखते हुए एक अनोखे स्वप्न के सफर पर निकल पड़ती है जिसे स्वप्न सिंदूरी शीर्षक दिया है। कथन सरल सरस मधुर और रोमांचित कर देने वाले हैं जिनकी सराहना बनती है। इस रचना में नायिका के अपने नायक के लिए समर्पित भाव का मनोहारी चित्रण किया गया है। नायिका की कल्पना उड़ान को क्षितिज के पार तक ले जाने का सार्थक प्रयास रहा है। अंत में सपनों में सपना की ही बात हो में कवयित्री द्वारा शीर्षक की महत्वता को स्पष्ट किया गया है। पूरी कविता पढ़ने से शब्द संयोजन, भाव का गूंथा रहना क्रम से कथ्य पाठक वर्ग को बांधे रखने के लिए पर्याप्त है।

स्वप्न शीर्षक से लिखी गई यह कविता कवयित्री की प्रतिनिधि रचनाओं में से एक है छंदमुक्त होने के साथ-साथ इस रचना में उनके कथन की प्रशंसा बनती रचना में मानवीकरण का प्रयोग, संदेशात्मक भाव प्रत्येक विषय को आत्मीयता से लिखने का प्रयास एक सफल प्रयास कहा जा सकता है। ब्रह्म मुहूर्त में जागने के लाभ बताते हुए जो सूर्योदय के पश्चात जागते हैं उन पर दबी कलम से कटाक्ष भी सराहनीय है। स्वप्न को यथार्थ तक ले जाने के लिए सकर्म मेहनत से सफलता पाने की प्रेरणा देती एक सुंदर रचना कवयित्री का संदेश परक मस्तिष्क भी स्पष्ट झलकता है। इस कविता के माध्यम से सुनहरी इतिहास गढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं शब्द संयोजन सरल है, कहन सीधा सपाट है पाठक वर्ग पढकर प्रोत्साहित अवश्य होंगे।
सावन शीर्षक से लिखी यह रचना कवयित्री की कल्पना का एक और सुदृढ पक्ष प्रस्तुत कर रही है। विरह वेदना रस में लिखी इस कविता में कवयित्री ने विरह अगन को भी बहुत ही सुंदर बिम्ब एवं मानवीकरण का प्रयोग करते हुए आम आदमी की भाषा शैली में ढाल दिया है। कविता की सरंचना प्रारम्भ से अंत तक लय बद्ध रही है। भाव निखार पर हैं पाठक वर्ग के द्वारा इस रचना को खूब सराहा जाएगा। उनकी प्रतिनिधि रचनाओं में से एक होने के कारण मैं इससे परिचित हूँ इसे मंच से सुना है तालियों की गड़गड़ाहट ने इस रचना की प्रासंगिकता को हाथों हाथ प्रोत्साहित किया है यही अपेक्षा पाठक वर्ग से भी रहेगी।
मुस्कुराऊँ कैसे कविता में कवियत्री ने मानव जीवन में आने वाली समस्याओं को लेकर बहुत सुंदर चित्रण किया है। मानवीय संवेदनाएं भोर की किरण बन कर अंधेरों को चीर कर निकल जाना चाहती हैं। गुलशन फूल का बिखराना प्रतीकात्मक खुशियों को बिखेरने से जोड़ कर बहुत सुंदर उपमा का प्रयोग किया गया आस पास के माहौल में पनप रहे अविश्वास को आँधियाँ से छल फरेबों में बाजियाँ स्वार्थ सिद्धि की ही लग रही हैं। बेहतरीन यथार्थ को प्रस्तुत किया है। प्रतीकात्मक शैली प्रारम्भ से अंत तक जीवंत है बिम्ब का चित्रण स्पष्ट प्रदर्शित है। सरल कथ्य उत्तम भाव कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना की कलम की विशेषता रही है जो इस रचना में भी स्पष्ट झलक रही है।
कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना की यादें एक तुकांत कविता है जो गजलनुमा काफिये रदीफ़ की तरह लिखी गई है तुकांत का स्तर उत्तम नहीं है पर सरल भाषा शैली ने इस कविता की सृजन संरचना को चार चांद लगाए हैं प्रत्येक पद अपने आप में पूर्णता को प्राप्त है जैसे ग़ज़ल के शेर अपने आप में एक पूर्ण कहानी कह देते हैं ठीक उसी प्रकार इस तुकांत कविता का सृजन किया गया है। भाव गहराई लिए हुए हैं। कवयित्री का कटाक्ष देखें उजालों में रहने की ख्वाहिश तो है मगर, घर जो जला दे उन उजालों का क्या करें। इस प्रकार से सम्पूर्ण रचना पाठक वर्ग को सरलता से समझ में आने वाली है।
कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना की रचना छाँव लगे प्रहरी में प्रतीकात्मक शैली का सजीव प्रयोग झलकता है तुकांत कविता के तुक सभी लाजवाब हैं सभी तुक सराहनीय हैं। यह कविता दिखने में छोटी है पर भाव गंभीरता लिए हुए हैं। विरह अग्नि की उपमा जेठ की दुपहरी और आस को छाँव सा प्रहरी खड़ा करके शानदार प्रतीकात्मक के साथ उपमा दर्शाई गई है जो सर्वत्र प्रशंसनीय है।

कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना का कलम से सम्बंध लगभग 25 वर्षों से निरन्तर चलता आ रहा है। तभी कलम की सुगंध परिपक्व झलकती है। इतनी समयावधि में अनेक नाटक लिखे हैं। जिन्हें आकाशवाणी द्वारा समय समय पर प्रसारित भी किया गया है। घर आंगन कार्यक्रम की प्रस्तुतकर्त्ता के रूप में सजीव कार्यक्रम प्रस्तुत किये हैं। आकाशवाणी  द्वारा वाणी प्रमाणपत्र प्राप्त कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना की कहानियाँ और कविताओं का प्रसारण होता रहा है ।  6 लघु काव्य संग्रह, सपना की काव्यांजलि काव्य संग्रह एवं 50 से अधिक साझा संग्रह में रचनाएं प्रकाशित हो चुके हैं। ऐसे में इस उपलब्धि से कहा जा सकता है कि कवयित्री 'अनिता मंदिलवार सपना' पाठक वर्ग की समझ की उस नब्ज को अच्छे से समझती और जानती भी हैं जिसके कारण यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि कवयित्री का यह काव्य संग्रह "स्वप्न सिंदूरी " पाठक वर्ग द्वारा खूब सराहना प्राप्त  कर सकेगा। 
अंततः इतना कहना अवश्य बनता है कि कवयित्री ने जिन-जिन विषय को संग्रह में सम्मिलित किया है वे सभी विषय दिखने में जितने सरल और साधारण विषय दिखते हैं समझने में उतने ही गहराई लिए हुए हैं। पाठक वर्ग के सभी स्वाद इसमें भरे हुए हैं। कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना का  अद्भुत एवं अनुपम काव्य संग्रह है ये स्वप्न सिंदूरी ... इसके प्रकाशक ए• के• वी• एस  प्रकाशन वाराणसी हैं इसका कार्य भी अति सराहनीय है आवरण पृष्ठ से आंतरिक पृष्ठ चयन, चित्रांकन और टंकण सब शुद्ध रूप से निखार पर हैं। कवयित्री द्वारा इस संग्रह को अपने जीवन साथी को समर्पित किया है। शुभकामना संदेश 1. डॉ. प्रेमसाय सिंह, स्कूल शिक्षा, अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण, सहकारिता छत्तीसगढ़ शासन 2. अमरेश्वर दुबे, पूर्व कार्यक्रम अधिकारी आकाशवाणी 3. महातम मिश्रा गौतम गोरखपुरी 4. जे पी श्रीवास्तव, प्रांताध्यक्ष, ट्रेड यूनियन कौंसिल छत्तीसगढ 5. गिरीश गुप्ता, जिला परियोजना अधिकारी, जिला लोक शिक्षा समिति, सरगुजा ने दिए हैं । 
काव्य-संग्रह की भूमिका शैलेन्द्र श्रीवास्तव, जिलाध्यक्ष कोरिया छत्तीसगढ़ , आँल इण्डिया ह्यूमन राइट्स एसोशियेशन (एहरा) नई दिल्ली, के कर कमलों से लिखी गई है जो पाठक वर्ग को कवियत्री से परिचित करवाने के लिए एक सार्थक प्रयास कहा जा सकता है। और अंत में समीक्षा का प्रभार मुझ संजय कौशिक विज्ञात को सौंपा गया जिसके लिए कवयित्री का आभार प्रकट करता हूँ।
पुस्तक का कमजोर पक्ष: कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना एक नाम ही पर्याप्त है जो त्रुटियों को दूर करने में सक्षम एवं समर्थ है। मेरे विवेक के अनुसार तो 'स्वप्न सिंदूरी ' काव्य-संग्रह में भक्तिरस, प्रेमरस, विरह रस, वीररस, करुणरस, विद्यमान होते हुए अनेक अलंकारों से अलंकृत काविताओं का सुगंधित उपवन है। जिसकी प्रत्येक कविता रूपी पुष्प की खुशबू पृथक एवं विशेष है। जिससे यह संग्रह सुवासित होता हुआ कलम की सुगंध को सदृश एवं आकर्षित बना देने में समर्थ सिद्ध है। कुछ एक स्थान पर टंकण दोष से इनकार नहीं किया जा सकता और कहीं कहीं लय बाधा भी दिखाई देती है। हालांकि कवयित्री के कंठ को माता वीणापाणि का विशेष वरदान प्राप्त है। जिसे आकाशवाणी का वाणी सम्मान सिद्ध भी करता है। तो इस कमी को वो स्वयं की गेयता में महसूस नहीं होने देंगी। अंततः इतना कहना अवश्य बनता है कि कवयित्री ने कविताओं के सृजन की साधना कुशलता पूर्वक संम्पन्न की है। संग्रह के मुख्य आवरण, शीर्षक और पृष्ठ संख्या ....132... सहित प्रकाशकीय मेहनत से संग्रह को चार चांद लग गए हैं। पाठक वर्ग कवियत्री के इस संग्रह को पढ़ने के बाद कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना के लिखे अन्य कविता संग्रह को भी पढ़ने की इच्छा रखते हुए उन्हें भी खोज कर अवश्य पढ़ेगा।

संजय कौशिक 'विज्ञात' 
समालखा, पानीपत हरियाणा 
पिन -132101 

Wednesday, April 8, 2020

मेरी दृष्टि से सपना की काव्यांजलि संजय कौशिक 'विज्ञात'


सपना की काव्यांजलि 
एक नज़र समीक्षा की दृष्टि से .... 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

कवयित्री अनिता मंदिलवार "सपना" ने जीव विज्ञान स्नातकोत्तर, हिन्दी साहित्य और अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर तीन-तीन स्नातकोत्तर करने के पश्चात जीव विज्ञान से ही अध्ययन अध्यापन कार्य से जुड़ी हुई हैं ऐसे में हिन्दी भाषा पर गहरी पकड़ बनाये रखते हुए लेखन की अनेक विधाएं कलम के माध्यम से सिद्ध हस्त हैं जिससे यह कहा जा सकता है कि कवयित्री को माता वीणापाणि का विशेष स्नेहाशीष प्राप्त है। 'सपना की काव्यांजलि' काव्य-संग्रह में बहुत ही सरलता है। आम बोल-चाल के हिन्दी शब्दों का प्रयोग कर उत्तम कहन को पंक्तिबद्ध किया गया है। कहीं कहीं तत्सम शब्दों का भी प्रयोग है तो कहीं तद्भव शब्दों का एक अनूठा प्रयोग करते हुए आंचलिक सम्पुट सहित इस काव्य संग्रह को श्रेष्ठ धाराप्रवाह में प्रवाहित किया है। छंद मुक्त, गीत, नवगीत, हिन्दी ग़ज़लनुमा कविता आदि जितनी भी विधाएं लिखी गई हैं सभी विधाओं में कवयित्री की कलम सिद्ध कलम की तरह चली है। अलंकारों के जोखिम से बचते हुए कविता संग्रह को क्लिष्टता से बचाकर सुनियोजित ढंग से संवारा गया है। जिसकी प्रत्येक कविता को भिन्न-भिन्न पाठक वर्ग द्वारा सहजता से पढ़ा और समझा जा सकेगा। कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना की कविताओं में बिम्ब शैली अच्छे से निखर कर समक्ष आती है। कवयित्री का कविता सृजन कार्य जिन दृश्यों से प्रेरित हो कर हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन दृश्यों ने कवयित्री के अंतः करण को गहराई तक छू लिया है। तभी कविताओं का भाव मर्मस्पर्शी होते हुए पूर्णतः निखर कर प्रकट हुआ है। 

कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना का लेखन अनुभव लगभग 25 वर्षों से निरन्तर चलता आ रहा है। इस समयावधि में अनेक नाटक लिखे हैं जिन्हें आकाशवाणी द्वारा समय समय पर प्रसारित किया गया । घर आंगन कार्यक्रम की प्रस्तुतकर्त्ता के रूप में सजीव कार्यक्रम प्रस्तुत भी किया है। आकाशवाणी द्वारा वाणी प्रमाणपत्र प्राप्त कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना सहित्यिकी कार्यक्रम के अंतर्गत कविताएं एवं कहानियों सहित कई रूपक भी प्रस्तुत करती रही हैं। 6 लघु काव्य संग्रह एवं 50 से अधिक साझा संग्रह में रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। ऐसे में इस उपलब्धि से कहा जा सकता है कि कवयित्री 'अनिता मंदिलवार सपना' पाठक वर्ग की नब्ज को अच्छे से समझती और जानती भी हैं जिसके कारण यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि कवयित्री का यह काव्य संग्रह "सपना की काव्यांजलि" पाठक वर्ग द्वारा खूब सराहना प्राप्त अवश्य करेगा। 
कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना की कविता उपकार एक भावनात्मक शैली में लिखी गई कविता है मानव जीवन मिला तो ईश्वर के आभार से शुरू करते हुए माता की ममता के उपकार पिता के उपकार को साभार मानते हुए जिन्होंने पठन पाठन में अभिरुचि उतपन्न की ऐसे गुरुवर के उपकार सहित परिणय सूत्र में बंधी अपने पति महोदय का भी आभार माना है जिन्होंने लड़की से स्त्री फिर सन्तति प्राप्ति के पश्चात माता की पदवी दिलाई कुल मिलाकर कवियत्री के भाव सम्पूर्ण नारी जगत के भावों का प्रतिनिधित्व करती हुई श्रेष्ठ मनोभाव अभिव्यक्ति कही जा सकती है जीवन लेकर अपने परिवेश में जिस-जिस के सम्पर्क में रही और सभी से जीवटता का सार प्राप्त किया सभी का आत्मीय आभार प्रकट करती हुई रचना का शीर्षक उपकार न्यायसंगत है। 
कोई बात बने शीर्षक से लिखी गई कविता मात्रा भार समान वाली सुंदर गेयता लिए हिन्दी भाषा में ग़ज़ल के समान सुंदर लय धारण किये हुए है बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति है। साधारण व्यक्ति के अंतरमन को छू जाने की अद्भुत क्षमता है कवयित्री में सुंदर संदेशात्मक कथन भी विद्यमान हैं अगर बेटियाँ उड़े गगन में ऊपर तक यहाँ कल्पना चावला, सुनीता का नाम नहीं है फिर भी विद्यमान है उन्हें प्रेरणा स्रोत बना कर आगे बढ़ने का बेहतर सन्देश है बंध में बेटियों को आगे बढ़ावा देने के आग्रह सहित कवयित्री ने उत्तम और श्रेष्ठ निष्कर्ष भी दिया है समाज में बदलाव की जिस क्रांति लाने को उनका मन बेचैन रहता है उसे कोई बात बने में अच्छे से सँवारा और उकेरा गया है अंत मे देशभक्ति को सर्वोपरि बताया इसे ही एक नया धर्म बनाने की कल्पना के पंख लिए उड़ान भरती रचना अपनी मंजिल तक पहुंच रही है।
नवगीत विधा पर कलम चलाते हुए कवयित्री ने आ बैठे उस पगडण्डी पर जिससे जीवन शुरू हुआ बहुत सुंदर लय बांधे हुए है इस गीत में सुंदर कहन का प्रयास किया बिम्ब सटीकता के चरम पर हैं पाठक गण इसे गुनगुनाते हुए मंत्रमुग्ध से रहेंगे। बेहद आकर्षित करता प्रेरणादायक स्वतः बोलता नवगीत है। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि कवयित्री जिस विधा पर भी कलम चलाती है वह विधा इन्हें स्वयं बाहें फैला कर स्वीकार कर लेती है और अपनत्व से गले लगाकर इनकी कलम के साथ साथ चलती है।
गीत विधा पर भी कवयित्री ने लयात्मक कलम चलाई है। बहुत ही अधिकार स्वरूप मुखड़ा लिया है एक तू ही तो अपना है बाकी सब सपना है प्रियतम के प्यार की उपमा अनमोल गहने से करना कवयित्री की भारतीय परम्परा एवं संस्कारों की मनोदशा को भी प्रदर्शित करती है प्रियतम का विरह या प्रियतम द्वारा दी जाने वाली पीड़ा को अपनी किस्मत मान चुकी कवयित्री की नायिका कल्पना अपनी सहन शक्ति का प्रमाण दे रही है तू थक तो नहीं गया मुझे बता दे बस, कि और कितना सहना शेष है कवयित्री की कल्पनाओं की वह नायिका दृढ़ संकल्पित है उन दुःखों के क्षणों में अपने जीवन साथी के साथ जीवन यापन करने के लिए, वह उनसे पीछा छुटाने की चाह तक नहीं रखती और कहती है कि एक तेरे सिवाय अपना किसी को नहीं मानती और जो दिख रहे हैं वो छलावा रूप में महज एक स्वप्न हैं कवयित्री कहती हैं कि तुम भले ही भूल गए हो पर वो इस विरह की आग में तपने के लिए तैयार है क्योंकि स्वर्ण बिना ताप के कभी भी महंगा कुंदन नहीं बन सकता और वो अगर भूला नहीं है तथा अधिकार स्वरूप किसी बात से रूठ कर चला गया है तो मिलन की माला जपने का भी संदेश देती है क्योंकि तेरे बिना मेरा भी अपना कोई नहीं है और यदि कोई समक्ष दिख रहा है तो वो मिथ्या स्वप्न है इस गीत में सुंदर लय गहरे भाव आत्मीयता के संबंध को निभाने का संकल्प, समर्पण, निश्छल प्रेम, विरह सब कुछ दिया है कवयित्री ने लाजवाब रचना पाठक एक बार पढ़ेगा तो बार-बार अवश्य पढ़ेगा।
सत्य और असत्य का भेद उल्लेखित करती रचना सत्य अटल पर झूठ चमकता में कवयित्री ने झूठ को मोती की चमक की उपमा दी है और इसे खोखला बताया है इससे बचने का भी संदेश दिया है भ्रमित करने वाली चमक और ऊँचें दामों की खनक भी सत्य की अटल सत्यता को कभी भी पछाड़ नहीं पाएगी इस प्रकार से बहुत सुंदर भाव और शानदार संदेश देती हुई रचना अच्छे भावों के साथ सरल शब्दों में लिखी गई है इस रचना को पाठक वर्ग द्वारा खूब सराहना मिलेगी। 
लाल तुम कहाँ गए कविता में पुलवामा से बालकोट तक के विस्फोटक हादसे से अपने पुत्र को गंवा चुकी माताओं पीड़ा तिरंगे के प्रति प्रेम भाव, जयचंदी गद्दारों पर कटाक्ष, जन्मभूमि के सजग रक्षक, के प्रति माँ का करुण क्रंदन का बिम्बात्मक चित्रण सहित अगली कविता ... कविता तुम कहाँ हो समस्त रसों में व्याप्त कविता का अच्छा मानवीकरण श्रृंगार कर बोलती कविता प्रतीत होती है अगली कविता कलम आज उनकी जय बोल अपने शीर्षक का स्वयं परिचय देती बहुत शानदार कविता है अगली कविता सोपान सुंदर लय और गेयता लिए गहरे भाव की कविता है जिसे पढ़ने से पता चलेगा कि सोपान कितने बाकी हैं अगली कविता सखी, सावन आयो रे आंचलिक सम्पुट से सुसज्जित कविता मन को गुदगुदाने वाली बहुत शानदार कविता है 
अंततः इतना कहना अवश्य बनता है कि कवयित्री ने जिन जिन विषय को संग्रह में लिखा है वो दिखने साधारण विषय अवश्य हैं पर गहराई लिए हुए हैं पाठक वर्ग के सभी रस इसमें विद्यमान हैं अनुपम काव्य संग्रह है ये सपना की काव्यांजलि... 
रवीना प्रकाशन से प्रकाशित होने वाला काव्य संग्रह सपना की काव्यांजलि अनुक्रमणिका पृष्ठ संख्या के पश्चात कवयित्री ने इस संग्रह को अपने स्वर्गीय माता-पिता को समर्पित किया है शुभकामना संदेश 1.. टी.एस. सिंहदेव मंत्री छत्तीसगढ़ शासन, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, चिकित्सा, शिक्षा, वाणिज्यिक कर 2. डॉ. प्रेमसाय सिंह, स्कूल शिक्षा, अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण, सहकारिता छत्तीसगढ़ शासन 3. राजकुमार धर द्विवेदी, वरिष्ठ उप सम्पादक, दैनिक नई दुनिया रायपुर छत्तीसगढ़ 
4 अमरेश्वर दुबे, पूर्व कार्यक्रम अधिकारी आकाशवाणी 5. महेश कुमार शर्मा राष्ट्रीय मंत्री अ. भा. राष्ट्रीय कवि संगम 6. शैलेन्द्र श्रीवास्तव स्वतंत्र लेखक 7. महातम मिश्रा गौतम गोरखपुरी 8. जे पी श्रीवास्तव 9. गिरीश गुप्ता ने दिए हैं । काव्य-संग्रह की भूमिका डॉ. सपन सिन्हा, मनेन्द्रगढ़ कोरिया छत्तीसगढ़ के कर कमलों से लिखी गई है जो पाठक वर्ग को कवियत्री से परिचित करवाने के लिए एक सार्थक प्रयास कहा जा सकता है 
पुस्तक का कमजोर पक्ष: कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना एक नाम ही पर्याप्त है जो त्रुटियों को दूर करने में सक्षम एवं समर्थ है। मेरे विवेक के अनुसार तो 'सपना की काव्यांजलि' काव्य-संग्रह में भक्तिरस, प्रेमरस, विरहरस, वीररस, करुणरस, विद्यमान होते हुए अनेक अलंकारों से अलंकृत काविताओं का एक सुंदर महकता बगीचा है। जिसकी प्रत्येक कविता रूपी पुष्प की खुशबू विशेष एवं पृथक है। जिससे यह संग्रह सुवासित हो रहा है। कुछ एक में भाव पक्ष के दोहराव से बचा जा सकता था। कहीं बहुवचन लिखा गया है वहाँ एक वचन लिखा जाता तो स्पष्टता निखर कर आती कहीं कहीं लय बाधा दिखाई अवश्य देती है हालांकि कवयित्री के कंठ को माता वीणापाणि का विशेष वरदान प्राप्त है इस कमी को वो स्वयं की गेयता में महसूस नहीं होने देंगी। अंततः इतना कहना अवश्य बनता है कि कवयित्री ने कविताओं के सृजन की साधना कुशलता पूर्वक संम्पन्न की है। संग्रह के मुख्य आवरण, शीर्षक और पृष्ठ संख्या ....... सहित प्रकाशकीय मेहनत से संग्रह को चार चांद लग गए हैं। पाठक वर्ग कवियत्री के इस संग्रह को पढ़ने के बाद कवयित्री अनिता मंदिलवार सपना के लिखे अन्य कविता संग्रह को भी ढूंढ ढूंढ कर पढ़ने की इच्छा अवश्य रखेगा।

संजय कौशिक 'विज्ञात' 

बारिश में भीगती नदी : कवयित्री आरती सिंह 'एकता' समीक्षक : संजय कौशिक 'विज्ञात'

कवयित्री आरती सिंह 'एकता' समीक्षक - संजय कौशिक 'विज्ञात'   बारिश...